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रविवार, 12 दिसम्बर 2010

समझदारी का तकाजा

उस रोज देखा कि सडक के किनारे धूप में एक आदमी पडा हुआ है. हड्डियों का मात्र ढाँचा रह गया है और बस कुछेक देर का मेहमान है. चलती सडक----बहुत से लोग आ-जा रहे थे. राहगीर उसकी तरफ देखते, थोडा ठहरते और फिर आगे बढ जाते. उसने भी क्षणभर के लिए ठहरकर उसकी तरफ देखा और आगे बढ गया.
वो अभी महज चन्द कदम ही चला होगा कि चलते-चलते अचानक से ठिठककर रूक गया, देखा बीच सडक में मुडा-तुडा, पुराना सा एक 100 रूपये का नोट पडा है. इधर-उधर निगाह दौडाई, कि कहीं कोई देख तो नही रहा. जब पूरी तरह से आश्वस्त हो गया कि किसी का भी ध्यान उसकी ओर नहीं है, तो उसने आहिस्ता से झुककर नोट उठाया और जेब के हवाले कर लम्बे-लम्बे डग भरता दूर निकल गया..........
शायद वो जानता था, कि दुनिया दया से नहीं समझदारी से चला करती है.....
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ज्योतिष की सार्थकता
धर्म यात्रा

24 comments:

Kunwar Kusumesh ने कहा…

कम शब्दों में गहरी बात आप कह जाते हैं

mahendra verma ने कहा…

चिंतन को बाध्य करती अच्छी लघुकथा।

karishna ने कहा…

कम शब्दों में बडी बात कह जाने की कला में तो आप माहिर हैं/
बहुत ही अच्छी लघुकथा, सोचने को विवश करती हुई/
प्रणाम/

karishna ने कहा…

कम शब्दों में बडी बात कह जाने की कला में तो आप माहिर हैं/
बहुत ही अच्छी लघुकथा, सोचने को विवश करती हुई/
प्रणाम/

राज भाटिय़ा ने कहा…

बहुत गहरी बात कह दी आप ने इस लघु कथा मे, धन्यवाद

Patali-The-Village ने कहा…

बहुत ही अच्छी लघुकथा|धन्यवाद|

Kajal Kumar ने कहा…

अब देखिये न नोट यूं सड़क पर ही पड़ा रहे ये भी कोई समझदारी तो नहीं ही हुई न :)

anshumala ने कहा…

अच्छी लघुकथा।

भारतीय नागरिक - Indian Citizen ने कहा…

sahI kiyA bande ne...

सुज्ञ ने कहा…

बोधदायक लघुकथा।

ठोकर खाती सम्वेदनाएं और लालची बनती भावनाएं।

'समझदारी'की समझ को अब समझना आवश्यक है।

डॉ॰ मोनिका शर्मा ने कहा…

सुंदर लघुकथा .... विचारणीय बात तो है....

शिवम् मिश्रा ने कहा…


बेहतरीन पोस्ट लेखन के बधाई !

आशा है कि अपने सार्थक लेखन से,आप इसी तरह, ब्लाग जगत को समृद्ध करेंगे।

आपकी पोस्ट की चर्चा ब्लाग4वार्ता पर है - पधारें - सांसद हमले की ९ वी बरसी पर संसद हमले के अमर शहीदों को विनम्र श्रद्धांजलि - ब्लॉग 4 वार्ता - शिवम् मिश्रा

निरंजन मिश्र (अनाम) ने कहा…

सुज्ञ जी ने बिल्कुल बजा फरमाया! हकीकत में आज सम्वेदनाएं ठोकरें खा रही हैं ओर लोभ, लालच तथा वासनापूर्ण भावनाएं समझदारी का नकाब ओढे घूम रही हैं!
बेहतरीन लघुकथा शर्मा साहेब!

नरेश सिह राठौड़ ने कहा…

मेरी नजर में और भी ज्यादा समझदार तब होता जब उसे ये भी पता होता की ये नोट किसका है |

दिगम्बर नासवा ने कहा…

कितना यथार्थ है इस बात में ... कड़ुवा सच ... और दोषी भी हम ही हैं ...

वन्दना ने कहा…

बहुत गहरी बात मगर साथ ही सोचने को मजबूर करती है कि आज इंसानियत कैसे ज़िन्दा ही दफ़न हो गयी है।

Indranil Bhattacharjee ........."सैल" ने कहा…

बहुत सुन्दर और मार्मिक लघुकथा !

विरेन्द्र सिंह चौहान ने कहा…

समझ नहीं पा रहा हूँ कि क्या लिखूँ? क्योंकि इतने कम शब्दों में आपने इतनी अच्छी कहानी लिख दी। ये मेरे लिए किसी जादू से कम नहीं है।

कहानी बेहद पसंद आई।

ajit gupta ने कहा…

आदमी का सडक पर पड़ा रहना, सरकार की जिम्‍मेदारी है लेकिन नोट का मिलना आपकी किस्‍मत है। यह भी तो सोचो।

देवेन्द्र पाण्डेय ने कहा…

...अच्छा है।

अल्पना वर्मा ने कहा…

अच्छी लघुकथा..
संवेदनाहीन होते इंसान हेतु व्यक्तिगत ज़रूरतें प्राथमिक होने लगी हैं .

ज़ाकिर अली ‘रजनीश’ ने कहा…

वत्‍स जी, कम शब्‍दों में गहरी बात कह दी आपने। बधाई।

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छुई-मुई सी नाज़ुक...
कुँवर बच्‍चों के बचपन को बचालो।

वन्दना ने कहा…

इस बार के चर्चा मंच पर आपके लिये कुछ विशेष
आकर्षण है तो एक बार आइये जरूर और देखिये
क्या आपको ये आकर्षण बांध पाया ……………
आपकी रचनात्मक ,खूबसूरत और भावमयी
प्रस्तुति भी कल के चर्चा मंच का आकर्षण बनी है
कल (20/12/2010) के चर्चा मंच पर अपनी पोस्ट
देखियेगा और अपने विचारों से चर्चामंच पर आकर
अवगत कराइयेगा और हमारा हौसला बढाइयेगा।
http://charchamanch.uchcharan.com

खबरों की दुनियाँ ने कहा…

वाह रे इंसान वाह ।अच्छी पोस्ट , शुभकामनाएं । पढ़िए "खबरों की दुनियाँ"